बचपन में हर बात हमारे लिए कौतूहल का विषय होती है, सब कुछ नया होता है इसलिए विस्मयकारी और सुखद आश्चर्य से भरा हुआ होता है। उस समय हम बातों और चीजों के पीछे छुपी अपनी भूमिका को नहीं जानते।
धीरे धीरे हम अपने आपको इन सब बातों के कर्ता के रूप में देखने लगते हैं, हमारा अहम बढ़ता है और फिर हर बात का आनंद खोता चला जाता है, मान अपमान हानि लाभ जय पराजय प्रतिस्पर्धा आदि बढ़ जाती है इसलिए आनंद समाप्त होता जाता है।
हर बात को लेकर हमारे अंदर उसे पहले से जानने समझने की भावना हमे भीतर से विस्मित होने नहीं देती। कोई भी बात पुलक नहीं जगाती इसीलिए चीजों और बातों में वो आनंद नहीं रहता।
इसका एक तरीका है जिसे हम विस्मृति कहते हैं। अपने पूर्व के अनुभवों को, स्मृतियों को कुछ देर के लिए परे रख कर, उनसे मुक्ति पाकर हर बात को एक नए तरीके से देखना सीखना।
उस एक क्षण में पूर्व की स्मृति से दूर होकर वर्तमान में जीना। अपने अनुभव को फिर उस एक क्षण में केंद्रित करना। हिसाब न करना, फिक्र न करना। छोटी छोटी चीजों में निहित आनंद को महसूस करना सीखना।
यह याद रखना ज्ञान और अनुभव बहुत बार आनंद पर बट्टा काट लेता है। स्वयं को थोड़ी छूट दो, आनंद चक्रवृद्धि दर से बढ़ेगा।
@ मन्यु आत्रेय

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