फ़िल्म मेरा साया (1966) के लोकप्रिय गीत 'नैनों में बदरा छाए बिजली सी चमके हाये' के शुरुवात में बजा मनमोहक सितार हो या फ़िल्म पाकीज़ा (1972) में रेल की सिटी बजने के साथ ही सितार वादन जो मुख्य अभिनेत्री मीना कुमारी की मनोदशा को दर्शाता है ।
जो श्रोताओं व दर्शकों का ध्यान आकर्षित करता है । सितार के जादूगर 'उस्ताद रईस खान' का ये सितारवादन चमत्कार से कम नहीं ।
शास्त्रीय संगीत के मेवात घराने के विख्यात सितार वादक उस्ताद रईस खान , गग्घे नज़ीर खान के भाई उस्ताद वाहिद खान के परिवार से थे । पिता उस्ताद मोहम्मद खान उनके गुरु रहे । जो स्वयं सितार वादक,बीनकार, रुद्रवीणा और सुरबहार के उस्ताद थे ।
इंदौर(म.प्र.) में 25 नवंबर 1939 में जन्मे । बड़े भोपाल में हुए और सेंट ज़ेवियर,मुम्बई में उच्च शिक्षा प्राप्त की । रईस खान साहब का व प्रख्यात हिंदी फिल्मों के संगीतकार मदन मोहन का साथ कई वर्षों का रहा ।
उस्ताद रईस खान और संगीतकार मदनमोहन का साथ हुआ पहली फ़िल्म पूजा के फूल ('64) गीत था 'मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है ' ।
उस्ताद जी के सितार ने ऐसा सुरीलापन पैदा किया कि मदनमोहन उनके मुरीद हो गए ।
मदन मोहन के संगीत में उस्ताद रईस खान के सितार की बहार देखिये
फ़िल्म ग़ज़ल('64) की खूबसूरत रचना 'नगमा ओ शेर की सौगात किसे पेश करूँ'(लता)
फ़िल्म 'दुल्हन एक रात की' का मधुर गीत 'मैंने रंग ली आज चुनरिया ' और 'सपनों में अगर मेरे तुम आओ तो सो जाऊं' (लता)
फ़िल्म 'नौनिहाल'('67) में रफी साहब के गाये गीत 'तुम्हारी जुल्फ के साये में शाम कर लूंगा' सितार अन्य वाद्यों से अलग सुनाई देता है ।
1969 में प्रदर्शित फ़िल्म 'चिराग़' का लता जी का गाया गीत 'छाई बरखा बहार पड़े अंगना फुहार' में गीत के मध्य सितार की लय ।
अन्य गीत की बानगी भी देखिए जिनमें सितार का प्रयोग गीत की मधुरता को चार चाँद लगा देता है
हीर राँझा('70) का गीत 'दो दिल टूटे दो दिल हारे'
दस्तक('70) - हम हैं मता ए कूचा बाजार की तरह और बैयाँ ना धरो बलमा
हंसते जख्म('73) - आज सोचा तो आंसू भर आये
दिल की राहें('73) - रस्म ए उल्फत को निभाएं तो निभाएं कैसे
इसके अलावा नौशाद ,शंकर जयकिशन ,लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ,ओ. पी. नैयर,जयदेव,कल्याणजी आनंदजी के संगीत में रचे गीतों को मधुर बनाया ।
राग भीमपलासी में बने 'मेरा साया' (1966) के गीत 'नैनों में बदरा छाए' में आरम्भिक व गीत के मध्य सितार की धुन, 'गंगा जमना' के गीत' ढूँढो ढूँढो रे साजना' के मध्य में सितार का शानदार प्रयोग, पाकीज़ा में पार्श्व संगीत में जहां भी सितार का प्रयोग है वो सभी उस्ताद रईस खान साहब का ही है ।
मदन मोहन व लताजी का साथ सर्वविदित है किंतु रईस खान साहब का योगदान उनके गीतों को सजाने,सँवारने व ऊंचाइयों पर ले जाने में कम न रहा।
इमदादखान(इटावा) घराने के सितारवादक उस्ताद विलायत खान मदन मोहन के मित्रों में थे । यही कारण रहा कि उनके भानजे रईस खान उनसे जुड़े और एक लंबे समय तक जुड़ाव रहा । एक समय ऐसा भी समय आया कि छोटी गलतफहमी की वजह से दोनों का साथ टूट गया जिससे सितार का प्रयोग मदन मोहन की फिल्मों में बंद हो गया । उनकी बाद कि वर्ष '74, '75 की फिल्मों मौसम, हिंदुस्तान की कसम,लैला मजनू,साहिब बहादुर में देखा जा सकता है । जिसके गीतों में सितार का प्रयोग नहीं किया गया ।
मृत्युपर्यन्त कला को समर्पित उस्ताद रईस खान पाकिस्तान की प्रसिद्ध गायिका बिल्किश खानम से विवाह पश्चात 1986 में पाकिस्तान चले गए। पाकिस्तान के राष्ट्रपति द्वारा वर्ष 2005 में प्राइड ऑफ परफॉरमेंस (Pride Of Performance) एवं पाकिस्तान के तीसरे सर्वोच्च नागरिक अवार्ड सितारा-ए-इम्तियाज़ से वर्ष 2017 में नवाज़ा गया । ये ऐसे पहले पाकिस्तानी कलाकार रहे जिन्होंने 2012 में भारतीय संसद में कला का प्रदर्शन किया ।
शंकर जयकिशन के नवोन्मेषी जैज़ संगीत एल्बम 'रागा- जैज़ स्टाइल' में भी इनका योगदान रहा । भारतीय रागों पर आधारित इस ग्यारह गीतों के इस एल्बम में sexophone, ट्रम्पेट,सितार ,तबला का सफल प्रयोग किया गया था ।
उनके सितार के उत्कृष्ट प्रयोग कई
हिंदी फिल्मों में रहे जिनमें प्रमुख हैं-
ढूँढो ढूँढो से साजना-
गंगा जमना(1961)
आप यूँ ही अगर हमसे मिलते रहे - एक मुसाफिर एक हसीना('62)
इशारों इशारों में दिल लेने वाले- कश्मीर की कली('64)
ओ मेरे सनम ओ मेरे सनम- संगम(1964)
जाइये आप कहाँ जाएंगे - मेरे सनम('65)
बहारों मेरा जीवन भी सँवारो- आखिरी खत('66)
तुम्हे याद करते करते - आम्रपाली('66)
फिर मिलोगे कभी इस बात का वादा कर लो-
ये रात फिर ना आयेगी(1966)
सजनवा बैरी हो गए हमार-
तीसरी कसम(1967)
चंदन सा बदन चंचल चितवन- सरस्वती चन्द्र('68)
इतना तो याद है मुझे - महबूब की मेंहदी('71)
'तुम जो मिल गए हो'-
हँसते ज़ख्म(1973)
मेरी सांसो को जो महका रही है - बदलते रिश्ते(1978)
इसके अलावा फिल्म सत्यम शिवम सुंदरम('78) के सभी गीतों में उस्तादजी के सितार का मधुरतम उपयोग संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने किया ।
इस महान साधक की मृत्यु लंबी बीमारी के बाद कराची(पाकिस्तान) में 6 मई 2017 को सतहत्तर की आयु में हुई।
Vimal Joshi
