Wednesday, October 27, 2021

सितार के जादूगर 'उस्ताद रईस खान' का ये सितारवादन चमत्कार से कम नहीं ।

फ़िल्म मेरा साया (1966) के लोकप्रिय गीत 'नैनों में बदरा छाए बिजली सी चमके हाये' के शुरुवात में बजा मनमोहक सितार हो या फ़िल्म पाकीज़ा (1972) में रेल की सिटी बजने के साथ ही सितार वादन जो मुख्य अभिनेत्री मीना कुमारी की मनोदशा को दर्शाता है । 
जो श्रोताओं व दर्शकों  का ध्यान आकर्षित करता है । सितार के जादूगर 'उस्ताद रईस खान' का ये सितारवादन चमत्कार से कम नहीं ।

शास्त्रीय संगीत के मेवात घराने के विख्यात सितार वादक उस्ताद रईस खान , गग्घे नज़ीर खान के भाई उस्ताद वाहिद खान के परिवार से थे । पिता उस्ताद मोहम्मद खान उनके गुरु रहे । जो स्वयं सितार वादक,बीनकार, रुद्रवीणा और सुरबहार के उस्ताद थे ।
इंदौर(म.प्र.) में 25 नवंबर 1939 में जन्मे । बड़े भोपाल में हुए और सेंट ज़ेवियर,मुम्बई में उच्च शिक्षा प्राप्त  की । रईस खान साहब का व प्रख्यात हिंदी फिल्मों के संगीतकार मदन मोहन का साथ कई वर्षों का  रहा । 
उस्ताद रईस खान और संगीतकार मदनमोहन का साथ हुआ पहली फ़िल्म पूजा के फूल ('64) गीत था 'मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है ' । 
उस्ताद जी के सितार ने ऐसा सुरीलापन पैदा किया कि मदनमोहन उनके मुरीद हो गए ।
मदन मोहन के संगीत में उस्ताद रईस खान के सितार की बहार देखिये 
फ़िल्म ग़ज़ल('64) की खूबसूरत रचना 'नगमा ओ शेर की सौगात किसे पेश करूँ'(लता)
फ़िल्म 'दुल्हन एक रात की' का मधुर गीत 'मैंने रंग ली आज चुनरिया ' और 'सपनों में अगर मेरे तुम आओ तो सो जाऊं' (लता) 
फ़िल्म 'नौनिहाल'('67) में रफी साहब के गाये गीत 'तुम्हारी जुल्फ के साये में शाम कर लूंगा' सितार अन्य वाद्यों से अलग सुनाई देता है ।
1969 में प्रदर्शित फ़िल्म 'चिराग़' का लता जी का गाया गीत 'छाई बरखा बहार पड़े अंगना फुहार' में गीत के मध्य सितार की लय ।
अन्य गीत की बानगी भी देखिए जिनमें सितार का प्रयोग गीत की मधुरता को चार चाँद लगा देता है 
हीर राँझा('70) का गीत 'दो दिल टूटे दो दिल हारे'
दस्तक('70) - हम हैं मता ए कूचा बाजार की तरह और बैयाँ ना धरो बलमा
हंसते जख्म('73) - आज सोचा तो आंसू भर आये
दिल की राहें('73) - रस्म ए उल्फत को निभाएं तो निभाएं कैसे 
इसके अलावा नौशाद ,शंकर जयकिशन ,लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ,ओ. पी. नैयर,जयदेव,कल्याणजी आनंदजी के संगीत में रचे गीतों को मधुर बनाया ।
राग भीमपलासी में बने 'मेरा साया' (1966) के गीत 'नैनों में बदरा छाए' में आरम्भिक व  गीत के मध्य सितार की धुन, 'गंगा जमना' के गीत' ढूँढो ढूँढो रे साजना' के मध्य में सितार का शानदार प्रयोग, पाकीज़ा में पार्श्व संगीत में जहां भी सितार का प्रयोग है वो सभी उस्ताद रईस खान साहब का ही है ।
मदन मोहन व लताजी का साथ सर्वविदित है किंतु रईस खान साहब का योगदान उनके गीतों को सजाने,सँवारने व ऊंचाइयों पर ले जाने में कम न रहा।
इमदादखान(इटावा) घराने के सितारवादक उस्ताद विलायत खान मदन मोहन के मित्रों में थे । यही कारण रहा कि उनके भानजे रईस खान उनसे जुड़े और एक लंबे समय तक जुड़ाव रहा । एक समय ऐसा भी समय आया कि छोटी गलतफहमी की वजह से दोनों का साथ टूट गया जिससे सितार का प्रयोग मदन मोहन की फिल्मों में बंद हो गया । उनकी बाद कि वर्ष '74, '75 की फिल्मों मौसम, हिंदुस्तान की कसम,लैला मजनू,साहिब बहादुर में देखा जा सकता है । जिसके गीतों में  सितार का प्रयोग नहीं किया गया ।
मृत्युपर्यन्त कला को समर्पित उस्ताद रईस खान पाकिस्तान की प्रसिद्ध गायिका बिल्किश खानम से विवाह पश्चात 1986 में पाकिस्तान चले गए। पाकिस्तान के राष्ट्रपति द्वारा वर्ष 2005 में प्राइड ऑफ परफॉरमेंस (Pride Of Performance) एवं पाकिस्तान के तीसरे सर्वोच्च नागरिक अवार्ड सितारा-ए-इम्तियाज़ से वर्ष 2017 में नवाज़ा गया । ये ऐसे पहले पाकिस्तानी कलाकार रहे जिन्होंने 2012 में भारतीय संसद में कला का प्रदर्शन किया ।
शंकर जयकिशन के नवोन्मेषी जैज़ संगीत एल्बम 'रागा- जैज़ स्टाइल' में भी इनका योगदान रहा । भारतीय रागों पर आधारित इस ग्यारह गीतों के इस एल्बम में sexophone, ट्रम्पेट,सितार ,तबला का सफल प्रयोग किया गया था ।
उनके सितार के उत्कृष्ट प्रयोग कई
हिंदी फिल्मों में रहे जिनमें प्रमुख हैं-
ढूँढो ढूँढो से साजना- 
गंगा जमना(1961)
आप यूँ ही अगर हमसे मिलते रहे - एक मुसाफिर एक हसीना('62)
इशारों इशारों में दिल लेने वाले- कश्मीर की कली('64)
ओ मेरे सनम ओ मेरे सनम- संगम(1964)
जाइये आप कहाँ जाएंगे - मेरे सनम('65)
बहारों मेरा जीवन भी सँवारो- आखिरी खत('66)
तुम्हे याद करते करते - आम्रपाली('66)
फिर मिलोगे कभी इस बात का वादा कर लो- 
ये रात फिर ना आयेगी(1966)
सजनवा बैरी हो गए हमार- 
तीसरी कसम(1967)
चंदन सा बदन चंचल चितवन- सरस्वती चन्द्र('68)
इतना तो याद है मुझे - महबूब की मेंहदी('71)
'तुम जो मिल गए हो'-
 हँसते ज़ख्म(1973)
मेरी सांसो को जो महका रही है - बदलते रिश्ते(1978)
इसके अलावा फिल्म सत्यम शिवम सुंदरम('78) के सभी गीतों में उस्तादजी के सितार का मधुरतम उपयोग संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने किया ।

इस महान साधक की मृत्यु लंबी बीमारी के बाद कराची(पाकिस्तान) में 6 मई 2017 को सतहत्तर की आयु में हुई।

Vimal Joshi

Tuesday, October 26, 2021

ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में अंतर :------

ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में  अंतर :------

भारत में प्राचीन काल से ही ऋषि मुनियों का बहुत महत्त्व रहा है। ऋषि मुनि समाज के पथ प्रदर्शक माने जाते थे और वे अपने ज्ञान और साधना से हमेशा ही लोगों और समाज का कल्याण करते आये हैं। आज भी वनों में या किसी तीर्थ स्थल पर हमें कई साधु देखने को मिल जाते हैं। धर्म कर्म में हमेशा लीन रहने वाले इस समाज के लोगों को ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी आदि नामों से पुकारते हैं। ये हमेशा तपस्या, साधना, मनन के द्वारा अपने ज्ञान को परिमार्जित करते हैं। ये प्रायः भौतिक सुखों का त्याग करते हैं हालाँकि कुछ ऋषियों ने गृहस्थ जीवन भी बिताया है। आईये आज के इस पोस्ट में देखते हैं ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में कौन होते हैं और इनमे क्या अंतर है ?

ऋषि कौन होते हैं

भारत हमेशा से ही ऋषियों का देश रहा है। हमारे समाज में ऋषि परंपरा का विशेष महत्त्व रहा है। आज भी हमारे समाज और परिवार किसी न किसी ऋषि के वंशज माने जाते हैं। 

ऋषि वैदिक परंपरा से लिया गया शब्द है जिसे श्रुति ग्रंथों को दर्शन करने वाले लोगों के लिए प्रयोग किया गया है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है वैसे व्यक्ति जो अपने विशिष्ट और विलक्षण एकाग्रता के बल पर वैदिक परंपरा का अध्ययन किये और विलक्षण शब्दों के दर्शन किये और उनके गूढ़ अर्थों को जाना और प्राणी मात्र के कल्याण हेतु उस ज्ञान को लिखकर प्रकट किये ऋषि कहलाये। ऋषियों के लिए इसी लिए कहा गया है "ऋषि: तु मन्त्र द्रष्टारा : न तु कर्तार : अर्थात ऋषि मंत्र को देखने वाले हैं न कि उस मन्त्र की रचना करने वाले। हालाँकि कुछ स्थानों पर ऋषियों को वैदिक ऋचाओं की रचना करने वाले के रूप में भी व्यक्त किया गया है। 

ऋषि शब्द का अर्थ

ऋषि शब्द "ऋष" मूल से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ देखना होता है। इसके अतिरिक्त ऋषियों के प्रकाशित कृत्य को आर्ष कहा जाता है जो इसी मूल शब्द की उत्पत्ति है। दृष्टि यानि नज़र भी ऋष से ही उत्पन्न हुआ है। प्राचीन ऋषियों को युग द्रष्टा माना जाता था और माना जाता था कि वे अपने आत्मज्ञान का दर्शन कर लिए हैं। ऋषियों के सम्बन्ध में मान्यता थी कि वे अपने योग से परमात्मा को उपलब्ध हो जाते थे और जड़ के साथ साथ चैतन्य को भी देखने में समर्थ होते थे। वे भौतिक पदार्थ के साथ साथ उसके पीछे छिपी ऊर्जा को भी देखने में सक्षम होते थे। 

ऋषियों के प्रकार

ऋषि वैदिक संस्कृत भाषा से उत्पन्न शब्द माना जाता है। अतः यह शब्द वैदिक परंपरा का बोध कराता है जिसमे एक ऋषि को सर्वोच्च माना जाता है अर्थात ऋषि का स्थान तपस्वी और योगी से श्रेष्ठ होता है। अमरसिंहा द्वारा संकलित प्रसिद्ध संस्कृत समानार्थी शब्दकोष के अनुसार ऋषि सात प्रकार के होते हैं ब्रह्मऋषि, देवर्षि, महर्षि, परमऋषि, काण्डर्षि, श्रुतर्षि और राजर्षि। 

सप्त ऋषि

पुराणों में सप्त ऋषियों का केतु, पुलह, पुलत्स्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ठ और भृगु का वर्णन है। इसी तरह अन्य स्थान पर सप्त ऋषियों की एक अन्य सूचि मिलती है जिसमे अत्रि, भृगु, कौत्स, वशिष्ठ, गौतम, कश्यप और अंगिरस तथा दूसरी में कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, भरद्वाज को सप्त ऋषि कहा गया है। 

मुनि किसे कहते हैं

मुनि भी एक तरह के ऋषि ही होते थे किन्तु उनमें राग द्वेष का आभाव होता था। भगवत गीता में मुनियों के बारे में कहा गया है जिनका चित्त दुःख से उद्विग्न नहीं होता, जो सुख की इच्छा नहीं करते और जो राग, भय और क्रोध से रहित हैं, ऐसे निस्चल बुद्धि वाले संत मुनि कहलाते हैं। 

मुनि शब्द मौनी यानि शांत या न बोलने वाले से निकला है। ऐसे ऋषि जो एक विशेष अवधि के लिए मौन या बहुत कम बोलने का शपथ लेते थे उन्हीं मुनि कहा जाता था। प्राचीन काल में मौन को एक साधना या तपस्या के रूप में माना गया है। बहुत से ऋषि इस साधना को करते थे और मौन रहते थे। ऐसे ऋषियों के लिए ही मुनि शब्द का प्रयोग होता है। कई बार बहुत कम बोलने वाले ऋषियों के लिए भी मुनि शब्द का प्रयोग होता था। कुछ ऐसे ऋषियों के लिए भी मुनि शब्द का प्रयोग हुआ है जो हमेशा ईश्वर का जाप करते थे और नारायण का ध्यान करते थे जैसे नारद मुनि। 

मुनि शब्द का चित्र,मन और तन से गहरा नाता है। ये तीनों ही शब्द मंत्र और तंत्र से सम्बन्ध रखते हैं। ऋग्वेद में चित्र शब्द आश्चर्य से देखने के लिए प्रयोग में लाया गया है। वे सभी चीज़ें जो उज्जवल है, आकर्षक है और आश्चर्यजनक है वे चित्र हैं। अर्थात संसार की लगभग सभी चीज़ें चित्र शब्द के अंतर्गत आती हैं। मन कई अर्थों के साथ साथ बौद्धिक चिंतन और मनन से भी सम्बन्ध रखता है। अर्थात मनन करने वाले ही मुनि हैं। मन्त्र शब्द मन से ही निकला माना जाता है और इसलिए मन्त्रों के रचयिता और मनन करने वाले मनीषी या मुनि कहलाये। इसी तरह तंत्र शब्द तन से सम्बंधित है। तन को सक्रीय या जागृत रखने वाले योगियों को मुनि कहा जाता था।

जैन ग्रंथों में भी मुनियों की चर्चा की गयी है। वैसे व्यक्ति जिनकी आत्मा संयम से स्थिर है, सांसारिक वासनाओं से रहित है, जीवों के प्रति रक्षा का भाव रखते हैं, अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, ईर्या (यात्रा में सावधानी ), भाषा, एषणा(आहार शुद्धि ) आदणिक्षेप(धार्मिक उपकरणव्यवहार में शुद्धि ) प्रतिष्ठापना(मल मूत्र त्याग में सावधानी )का पालन करने वाले, सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव, वंदन, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायतसर्ग करने वाले तथा केशलोच करने वाले, नग्न रहने वाले, स्नान और दातुन नहीं करने वाले, पृथ्वी पर सोने वाले, त्रिशुद्ध आहार ग्रहण करने वाले और दिन में केवल एक बार भोजन करने वाले आदि 28 गुणों से युक्त महर्षि ही मुनि कहलाते हैं। 

मुनि ऋषि परंपरा से सम्बन्ध रखते हैं किन्तु वे मन्त्रों का मनन करने वाले और अपने चिंतन से ज्ञान के व्यापक भंडार की उत्पति करने वाले होते हैं। मुनि शास्त्रों का लेखन भी करने वाले होते हैं 

साधु कौन होते हैं 

किसी विषय की साधना करने वाले व्यक्ति को साधु कहा जाता है। प्राचीन काल में कई व्यक्ति समाज से हट कर या कई बार समाज में ही रहकर किसी विषय की साधना करते थे और उस विषय में विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करते थे। विषय को साधने या उसकी साधना करने के कारण ही उन्हें साधु कहा गया। 

कई बार अच्छे और बुरे व्यक्ति में फर्क करने के लिए भी साधु शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसका कारण है कि सकारात्मक साधना करने वाला व्यक्ति हमेशा सरल, सीधा और लोगों की भलाई करने वाला होता है। आम बोलचाल में साध का अर्थ सीधा और दुष्टता से हीन होता है। संस्कृत में साधु शब्द से तात्पर्य है सज्जन व्यक्ति। लघुसिद्धांत कौमुदी में साधु का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि "साध्नोति परकार्यमिति साधु : अर्थात जो दूसरे का कार्य करे वह साधु है। साधु का एक अर्थ उत्तम भी होता है ऐसे व्यक्ति जिसने अपने छह विकार काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर का त्याग कर दिया हो, साधु कहलाता है। 

साधु के लिए यह भी कहा गया है "आत्मदशा साधे " अर्थात संसार दशा से मुक्त होकर आत्मदशा को साधने वाले साधु कहलाते हैं। वर्तमान में वैसे व्यक्ति जो संन्यास दीक्षा लेकर गेरुआ वस्त्र धारण करते हैं और जिनका मूल उद्द्येश्य समाज का पथ प्रदर्शन करते हुए धर्म के मार्ग पर चलते हुए मोक्ष को प्राप्त करते हैं, साधु कहलाते हैं। 

संन्यासी किसे कहते हैं

सन्न्यासी धर्म की परम्परा प्राचीन हिन्दू धर्म से जुडी नहीं है। वैदिक काल में किसी संन्यासी का कोई उल्लेख नहीं मिलता। सन्न्यासी या सन्न्यास की अवधारणा संभवतः जैन और बौद्ध धर्म के प्रचलन के बाद की है जिसमे सन्न्यास की अपनी मान्यता है। हिन्दू धर्म में आदि शंकराचार्य को महान सन्न्यासी माना गया है। 

सन्न्यासी शब्द सन्न्यास से निकला हुआ है जिसका अर्थ त्याग करना होता है। अतः त्याग करने वाले को ही सन्न्यासी कहा जाता है। सन्न्यासी संपत्ति का त्याग करता है, गृहस्थ जीवन का त्याग करता है या अविवाहित रहता है, समाज और सांसारिक जीवन का त्याग करता है और योग ध्यान का अभ्यास करते हुए अपने आराध्य की भक्ति में लीन हो जाता है। 

हिन्दू धर्म में तीन तरह के सन्न्यासियों का वर्णन है

परिव्राजकः सन्न्यासी : भ्रमण करने वाले सन्न्यासियों को परिव्राजकः की श्रेणी में रखा जाता है। आदि शंकराचार्य और रामनुजनाचार्य परिव्राजकः सन्यासी ही थे। 

परमहंस सन्न्यासी : यह सन्न्यासियों की उच्चत्तम श्रेणी है। 

यति : सन्यासी : उद्द्येश्य की सहजता के साथ प्रयास करने वाले सन्यासी इस श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। 

वास्तव में संन्यासी वैसे व्यक्ति को कह सकते हैं जिसका आतंरिक स्थिति स्थिर है और जो किसी भी परिस्थिति या व्यक्ति से प्रभावित नहीं होता है और हर हाल में स्थिर रहता है। उसे न तो ख़ुशी से प्रसन्नता मिलती है और न ही दुःख से अवसाद। इस प्रकार निरपेक्ष व्यक्ति जो सांसारिक मोह माया से विरक्त अलौकिक और आत्मज्ञान की तलाश करता हो संन्यासी कहलाता है। 

उपसंहार

ऋषि, मुनि, साधु या फिर संन्यासी सभी धर्म के प्रति समर्पित जन होते हैं जो सांसारिक मोह के बंधन से दूर समाज कल्याण हेतु निरंतर अपने ज्ञान को परिमार्जित करते हैं और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हेतु तपस्या, साधना, मनन आदि करते हैं।

Saturday, October 23, 2021

रिश्ते में मित्रता💐*

*💐रिश्ते में मित्रता💐*

      मम्मी जी के चेहरे की चमक और किचन से आती पकवानों की महक दोनों की वजह एक ही है. आज लंच में उनकी एक फ्रेंड आने वाली हैं, कल ही बता दिया था उन्होंने.
कल ही मेरे साथ अपनी फ्रेंड को गिफ्ट में देने के लिए महंगी सी साड़ी भी ले आईं. आज मुझसे भी पहले किचन में घुस गई और बड़े जतन से खुद से तैयार की गई पकवानों की लिस्ट में से एक के बाद एक डिश बनानी भी शुरू कर दी.
खूब खुश नजर आ रही हैं पर मैं बेमन बनावटी मुस्कान चेहरे पर सजाए काम में उनका हाथ बटा रही हूँ.
मायके में मेरी माँ का आज जन्मदिन है . शादी के बाद यह माँ का पहला जन्मदिन होगा जब कोई भी उनके साथ नहीं होगा। अब मैं यहाँ, पापा ऑफिस टूर पर और भाई तो है ही परदेस में.
मायके जाने के लिए कल मम्मी जी से बोलने ही वाली थी कि उन्होंने मेरे बोलने से पहले ही अपनी फ्रेंड के आने वाली बात सामने रख दी. दोपहर में लंच और शाम को हम सभी का उनके साथ फन सिटी जाने का प्रोग्राम तय हो चुका था.
क्या कहती मन मार कर रह गई. घर को सजाया और खुद को भी बेमन सी सँवर गई. कुछ ही देर में डोर बेल बजी उनका स्वागत करने के लिए मम्मी जी ने मुझे ही आगे कर दिया.
गेट खोला बड़े से घने गुलदस्ते के पीछे छिपा चेहरा जब नजर आया तो मेरी आंखें फटी की फटी और मुँह खुला का खुला रह गया. सामने मेरी माँ खड़ीं थीं. माँ मुझे गुलदस्ता पकड़ाते हुए बोली सरप्राइज
हैरान खड़ी मैं अपनी माँ को निहार रही थी. बर्थडे विश नहीं करोगी हमारी फ्रेंड को? पीछे खड़ी मम्मी जी बोली.
माँ आपकी फ्रेंड?
 अरे भाई झूठ थोड़ी ना कहा था हमने और फिर किसने कहा कि समधिन-समधिन दोस्त नहीं हो सकती.
बिल्कुल हो सकती है जो अपनी बहू को बेटी जैसा लाड़ दुलार करें सिर्फ वही समधिन को दोस्त बना सकती है. कहते हुए माँ ने आगे बढ़कर मम्मी जी को गले लगा लिया.
मेरे मुँह से एक शब्द भी ना निकल पाया बस मैंने मम्मी जी की हथेलियों को अपनी आंखों से स्पर्श करके होठों से चूम लिया. माँ हम दोनों को देखकर भीगी पलकों के साथ मुस्कुरा पड़ीं.
एक तरफ मेरी माँ खड़ी थी जिन्होंने मुझे रिश्तों की अहमियत बताई और दूसरी तरफ मम्मी जी जिनसे मैंने सीखा रिश्तों को दिल से निभाना. दोनों मुझे देखकर जहाँ मुस्कुरा रही थी वही मैं दोनों के बीच खड़ी अपनी किस्मत पर इतरा रही थी.

■ साक्षी 

गुरुबक्षणी निवास स्ट्रीट 5 रविग्राम तेलीबांधा गर्ल्स स्कूल के सामने रायपुर 492006
8109224468 मोबाइल

मृत्यु के पश्चात मनुष्य के साथ पाँच वस्तुएँ जाती हैं।*

*मृत्यु के पश्चात मनुष्य के साथ मनुष्य की पाँच वस्तुएँ साथ जाती हैं।*

1. *कामना*-यदि मृत्य के समय हमारे मन मे किसी वस्तु विशेष के प्रति कोई आसक्ति शेष रह जाती है,कोई इक्षा अधूरी रह जाती है,कोई अपूर्ण कामना रह जाती है तो मरणोपरांत भी वही कामना उस जीवात्मा के साथ जाती है। 
2. *वासना*- वासना कामना की ही साथी है। वासना का अर्थ केवल शारिरिक भोग से नही अपितु इस संसार मे भोगे हुए हर उस सुख से है जो उस जीवात्मा को आनन्दित करता है। फिर वो घर हो ,पैसा हो ,गाड़ी हो, रूतबा हो,या शौर्य। मृत्यु के बाद भी ये अधूरी वासनाएं मनुष्य के साथ ही जाती हैं और मोक्ष प्राप्ति में बाधक होती है।
3.*कर्म*- मृत्यु के बाद हमारे द्वारा किये गए कर्म चाहे वो सुकर्म हो अथवा कुकर्म हमारे साथ ही जाता है। मरणोपरांत जीवात्मा अपने  द्वारा कि ये गए कर्मो की पूँजी भी साथ ले जाता है। जिस के हिसाब किताब द्वारा उस जीवात्मा का यानी हमारा अगला जन्म निर्धारित किया जाता है।
4. *कर्ज़*- यदि मनुष्य ने आपने जीवन मे कभी भी किसी प्रकार का ऋण लिया हो तो उस ऋण को यथासम्भव उतार देना चाहिए ताकि मरणोपरांत इस लोक से उस ऋण को उसलोक में अपने साथ न ले जाना पड़े।
5. *पुण्य*- हमारे द्वारा किये गए दान-दक्षिणा व परमार्थ के कार्य ही हमारे पुण्यों की पूंजी होती है इसलिए हमें समय-समय पर अपने सामर्थ्य अनुसार दान-दक्षिणा एवं परमार्थ और परोपकार आवश्य ही करने चाहिए। 
इन्ही पांचों वस्तुओं से ही मनुष्य को इस मृत्युलोक को छोड़ कर परलोक जाने पर उस लोक अथवा अगले जन्म की प्रक्रिया का चयन किया जाता है।

प्रस्तुति 

प्रो रविन्दर 

गर्ल्स स्कूल के सामने गुरुबक्षणी निवास स्ट्रीट 5 रविग्राम तेलीबांधा रायपुर छग 492006
8109224468 मोबाइल

Thursday, October 21, 2021

चार्ली चैम्पलीन

चार्ली चैम्पलीन कहते थे

चार्ली चैपलिन 88 वर्ष जीवित रहे
वो हमारे लिए 4 बयान छोड़ गए :

1.इस दुनिया में कुछ भी हमेशा के लिए नहीं है, हमारी समस्याएं भी नहीं.

2.मुझे बारिश में घूमना बहुत पसंद है क्योंकि कोई भी मेरे आँसू नहीं देख सकता.

3.जीवन का सबसे दुःखद दिन वह दिन होता है जब हम हँसते नहीं.

4.दुनिया के छह सर्वश्रेष्ठ डॉक्टर 

I  सूर्य 
II आराम
III व्यायाम 
IV आहार
V  स्वाभिमान
VI  दोस्त

अपने जीवन के सभी चरणों में उनके साथ रहें और स्वस्थ जीवन का आनंद लें

यदि आप चाँद को देखते हैं तो आप प्रकृति की सुंदरता देखेंगे

यदि आप सूर्य को देखते हैं, तो आप प्रकृति के तेज को देखेंगे

यदि आप एक दर्पण देखते हैं तो आप  प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ रचना देखेंगे

तो यकीन मानिए हम सभी पर्यटक हैं, जीवन का आनंद लें
जीवन बस एक यात्रा है
इसलिए भरपूर जिओ
सदा हँसते मुस्कुराते रहे

Wednesday, October 20, 2021

बचपन की पिटाई

*आजकल के बच्चे ये कभी नहीं जान पाएंगे कि  पुराने जमाने में हमें निम्नलिखित कारणों से कूटा जाता था:-*

1. पिटने के बाद रोने पर।
2. पिटने के बाद नहीं रोने पर।
3. बिना पिटे रोने पर।
4. दोस्तों के साथ खेलने-कूदने पर।
5. दोस्तों के साथ नहीं खेलने-कूदने पर।
6. जहां बड़े बैठे हों वहां टहलने पर।
7. बड़ों को जवाब देने पर।
8. बड़ों को जवाब नहीं देने पर।
9. बहूत समय तक बिना पिटे रहने पर।
10. उपदेश पर गाना गुनगुनाने पर।
11. अतिथियों को प्रणाम नहीं करने पर।
12. अतिथियों के लिए बनाए नाश्ते पर हाथ साफ करने पर।
13. अतिथियों के जाते समय साथ जाने की जिद पर।
14. खाने से मना करने पर।
15. सूर्यास्त के बाद घर आने पर।
16. पड़ोसियों के यहां खाना खा लेने पर।
17.  जिद्दी होने पर।
18. अति उत्साही होने पर।
19. हम उम्र बच्चों के साथ लड़ाई में हार जाने पर।
20. हम उम्र बच्चों के साथ लड़ाई में जीत जानेपर।
21. धीरे-धीरे खाने पर।
22. जल्दी-जल्दी खाने पर।
23. बड़े जाग गए हों तो सोते रहने पर।
24. अतिथियों को खाते समय निहारने पर।
25. चलते समय रपट कर गिर जाने पर।
26. बड़ों के साथ नजरें मिलाने पर।
27. बड़ों के साथ नजरें नहीं मिलाने पर।
28. बड़ों के साथ बात करते समय पलकें झपकाने पर।
29. बड़ों के साथ बात करते समय पलकें नहीं झपकाने पर।
30. रोते हुए बच्चे को देखकर हंसने पर।

 
कूटे ही नही "भय़ंकर कूटे" जाते थे. ....   जब रोना निकल जाता था ..  तब ... चिल्ला कर कहा जाता था ....
अबे  चुप होता है ..
कि    ...उठाएं जूता ...
😂😂
लेकिन
वो प्यार का तरीका अदभुत था, सब कुछ हमारी भलाई के लिये ही  था ...
अपने माता पिता व कूटने डाँटने वाले सभी बड़े-बुजुर्गों को सादर प्रणाम.🙏🙏🙏🙏❤️❤️❤️❤️

Tuesday, October 19, 2021

बेचारे वर्माजी - हास्यकथा(गीतों भरी कहानी)

बेचारे वर्माजी - हास्यकथा
(गीतों भरी कहानी) 
   
वर्मा जी भाभीजी और साली को लेकर कार से कहीं जाने वाले थे। कार में गाने सुनने के लिए मुझसे से "पैन ड्राइव" ले गए
पैन ड्राइव में मैंने  कल ही "सुख-दुःख" टाइटल वाले कुछ गाने भर के रखे थे
 कार वर्मा जी चला रहै थे.....
भाभीजी पीछे बैठी,साली अगली सीट पर बैठी...
म्यूज़िक चालू किया,पहला गाना बजा 
आगे सुख तो पीछे दुख है...
भाभी जी गुस्सा हो गई.... 
"गाड़ी रोको" और कार से उतर गई,साली साहिबा भी उतर गई... 
जैसे तैसे समझाया....
भाभीजी अगली सीट पर बैठी साली पीछे की सीट पर बैठ गई......
कार चली.... 
तब तक गाना चेंज हो गया..... 
आना जाना लगा रहेगा, दुःख आएगा, सुख जाएगा...
भाभी जी फुल  गुस्सा !
 गाड़ी रूकवाई.....!
और गुस्से में खुद भी साली के साथ पिछली सीट पर बैठ गई.... 
कार फिर चली.......अगला गाना बजा
सुख दुख दोनों रहते जिसमें जीवन है वो गांव, कभी धूप तो कभी छांव...
भाभीजी अब गुस्से में वर्माजी को भला बुरा सुनाने लगी......
जान बूझ कर ऐसे गाने बजा रहे हो, मुझे चिढ़ाने के लिए? 
गुस्से में साली को फिर अगली सीट पर भेज दिया....
आगे बढ़े......
अगला गाना आया
राही मनवा दुख की चिंता क्यों सताती है दुख तो अपना साथी है, सुख है एक छांव ढलती, आती है जाती है....
  अब तो भाभी जी बिफर गई .....
चौक पर बड़बड़ाते हुए कार से उतर कर एक रोड पर मुड़ गई......
माहौल बिगड़ता देख साली भी कार से उतर कर दूसरी रोड पर पैदल चली गईं
ड्राइविंग सीट पर बैठे वर्माजी ने सोचा...
पत्नी को मनाने इधर जाऊं या साली को मनाने उधर जाऊं ?
तब तक अगला गाना शुरू हो गया
संसार है एक नदिया, सुख दुख दो किनारे हैं, ना जाने कहाँ जायें हम बहते धारे हैं...

प्रस्तुति 

रवि के गुरुबक्षणी 
स्ट्रीट 5 गुरुबक्षणी निवास धर्मशाला के सामने रविग्राम तेलीबांधा रायपुर छग 492006

ऑनलाइन की दुनिया*

*ऑनलाइन की दुनिया*

एक बार मैं अपने अंकल के साथ एक बैंक में गया, क्यूँकि उन्हें कुछ पैसा कही ट्रान्सफ़र करना था।

ये स्टेट बैंक एक छोटे से क़स्बे के छोटे से इलाक़े में था। वहां एक घंटे बिताने के बाद जब हम वहां से निकले तो उन्हें पूछने से मैं अपने आप को रोक नहीं पाया।

अंकल क्यूँ ना हम घर पर ही इंटर्नेट बैंकिंग चालू कर ले?

अंकल ने कहा ऐसा मैं क्यूँ करूँ ?

तो मैंने कहा कि अब छोटे छोटे ट्रान्सफ़र के लिए बैंक आने की और एक घंटा टाइम ख़राब करने की ज़रूरत नहीं, और आप जब चाहे तब घर बैठे अपनी ऑनलाइन शॉपिंग भी कर सकते हैं। हर चीज़ बहुत आसान हो जाएगी। मैं बहुत उत्सुक था उन्हें नेट बैंकिंग की दुनिया के बारे में विस्तार से बताने के लिए।

 इस पर उन्होंने पूछा ....अगर मैं ऐसा करता हूँ तो क्या मुझे घर से बाहर निकलने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी?

 मुझे बैंक जाने की भी ज़रूरत नहीं?

मैंने उत्सुकतावश कहा, हाँ आपको कही जाने की जरुरत नही पड़ेगी और आपको किराने का सामान भी घर बैठे ही डिलिवरी हो जाएगा और ऐमज़ॉन, फ़्लिपकॉर्ट व स्नैपडील सबकुछ घर पे ही डिलिवरी करते हैं।

उन्होने इस बात पे जो जवाब मुझे दिया उसने मेरी बोलती बंद कर दी।

उन्होंने कहा आज सुबह जब से मैं इस बैंक में आया, मै अपने चार मित्रों से मिला और मैंने उन कर्मचारियों से बातें भी की जो मुझे जानते हैं।
 मेरे बच्चें दूसरे शहर में नौकरी करते है और कभी कभार ही मुझसे मिलने आते जाते हैं, पर आज ये वो लोग हैं जिनका साथ मुझे चाहिए। मैं अपने आप को तैयार कर के बैंक में आना पसंद करता हुँ, यहाँ जो अपनापन मुझे मिलता है उसके लिए ही मैं वक़्त निकालता हूँ।

दो साल पहले की बात है मैं बहुत बीमार हो गया था। जिस मोबाइल दुकानदार से मैं रीचार्ज करवाता हूं, वो मुझे देखने आया और मेरे पास बैठ कर मुझसे सहानुभूति जताई और उसने मुझसे कहा कि मैं आपकी किसी भी तरह की मदद के लिए तैयार हूँ।

वो आदमी जो हर महीने मेरे घर आकर मेरे यूटिलिटी बिल्स ले जाकर ख़ुद से भर आता था, जिसके बदले मैं उसे थोड़े बहुत पैसे दे देता था उस आदमी के लिए कमाई का यही एक ज़रिया था और उसे ख़ुद को रिटायरमेंट के बाद व्यस्त रखने का तरीक़ा भी !

कुछ दिन पहले मोर्निंग वॉक करते वक़्त अचानक मेरी पत्नी गिर पड़ी, मेरे किराने वाले दुकानदार की नज़र उस पर गई, उसने तुरंत अपनी कार में डाल कर उसको घर पहुँचाया क्यूँकि वो जानता था कि वो कहा रहती हैं।

अगर सारी चीज़ें ऑन लाइन ही हो गई तो मानवता, अपनापन, रिश्ते - नाते सब ख़त्म ही नही हो जाएँगे !

मैं हर वस्तु अपने घर पर ही क्यूँ मँगाऊँ ?

मैं अपने आपको सिर्फ़ अपने कम्प्यूटर से ही बातें करने में क्यूँ झोंकू ?

मैं उन लोगों को जानना चाहता हूँ जिनके साथ मेरा लेन-देन का व्यवहार है, जो कि मेरी निगाहों में सिर्फ़ दुकानदार नहीं हैं।
इससे हमारे बीच एक रिश्ता, एक बन्धन क़ायम होता है !

क्या ऐमज़ॉन, फ़्लिपकॉर्ट या स्नैपडील ये रिश्ते-नाते , प्यार, अपनापन भी दे पाएँगे ?

फिर उन्होने बड़े पते की एक बात कही जो मुझे बहुत ही विचारणीय लगी, आशा हैं आप भी इस पर चिंतन करेंगे........
उन्होने कहां कि ये घर बैठे सामान मंगवाने की सुविधा देने वाला व्यापार उन देशों मे फलता फूलता हैं जहां आबादी कम हैं और लेबर काफी मंहगी है।

भारत जैसे 130 करोड़ की आबादी वाले गरीब एंव मध्यम वर्गीय बहुल देश मे इन सुविधाओं को बढ़ावा देना आज तो नया होने के कारण अच्छा लग सकता हैं पर इसके दूरगामी प्रभाव बहुत ज्यादा नुकसानदायक होंगे।

देश मे 80% जो व्यापार छोटे छोटे दुकानदार गली मोहल्लों मे कर रहे हैं वे सब बंद हो जायेगे और बेरोजगारी अपने चरम सीमा पर पहुंच जायेगी। तो अधिकतर व्यापार कुछ गिने चुने लोगों के हाथों मे चला जायेगा हमारी आदते ख़राब और शरीर इतना आलसी हो जायेगा की बहार जाकर कुछ खरीदने का मन नहीं करेगा। 
जब ज्यादातर धन्धे व् दुकाने ही बंद हो जायेंगी तो रेट कहाँ से टकराएँगे तब.
ये ही कंपनिया जो अभी सस्ता माल दे रही है वो ही फिर मनमानी किम्मत हमसे वसूल करेगी। हमे मजबूर होकर सबकुछ ओनलाइन पर ही खरीदना पड़ेगा।और ज्यादातर जनता बेकारी की ओर अग्रसर हो जायेगी।

मैं आजतक उनको क्या जबाब दूं ये नही समझ पाया हूं . 

प्रस्तुति 

रवि के गुरुबक्षाणी

स्ट्रीट 5 धर्मशाला के सामने रविग्राम गुरुबक्षणी निवास रायपुर छग 492006

58 की उम्र ध्यान दे

 58 वर्ष से ज्यादा उम्रवाले ध्यान दे 

संयुक्त राज्य अमेरिका में एक अध्ययन में कहा गया है कि 51% से अधिक बुजुर्ग सीढ़ियां चढ़ने के दौरान गिर जाते हैं। अमेरिका में हर साल सीढ़ियां चढ़ने से 20,000 मौतें होती हैं।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि 58 वर्ष की आयु के बाद निम्नलिखित 10 क्रियाएं न करें:

  1. सीढ़ियों/सीढ़ी पर चढ़ना
  2. बहुत तेजी से मुड़ें  मुड़ना/घूमना 
  3. अपने पैरों पर झुकना 
  4. खड़े होकर पैंट पहनना
  5. सिट अप्स
  6. बाएँ और दाएँ मुड़ना  l
  7. पीछे हटना
  8. भारी सामान उठाने के लिए झुकना 
  9. अचानक बिस्तर से खड़े हो जाना
 10. बहुत  तनाव में रहना 

58 साल की उम्र के बाद कोशिश करें कि उपरोक्त 10 काम न करें।

वृद्धावस्था की चार आम समस्याएं।

 1. गले में भोजन फंसने से दम घुटन ।
 2. गलत तकिया।
 3. पैर में ऐंठन।
 4. झुनझुनी पैर।

 इस प्रकार मदद कैसे करें:

 1. भोजन का दम घोंटना:
     आपको केवल "हाथ ऊपर उठाने" की आवश्यकता है। हाथों को सिर के ऊपर उठाने से आपके गले में फंसा खाना अपने आप नीचे चला जाएगा।प

 2. गलत तकिए:
      कभी-कभी जब आप उठते हैं तो आपको गर्दन में दर्द महसूस होता है। तकिया गलत होने पर क्या करें? आपको केवल अपने पैरों को ऊपर उठाने की जरूरत है, फिर अपने पैर की उंगलियों को खींचकर दक्षिणावर्त या वामावर्त दिशा में मालिश करें।

 3. पैरों में ऐंठन:
      जब आपके बाएं पैर में ऐंठन महसूस हो, तो अपने दाहिने हाथ को ऊपर उठाएं, जब आपके दाहिने पैर में ऐंठन हो, तो अपने बाएं हाथ को ऊपर उठाएं, यह तुरंत बेहतर महसूस करेगा।

 4. झुनझुनी पैर:
      जब बायां पैर झुनझुनी हो तो अपनी दाहिनी हथेली को अपनी पूरी ताकत से घुमाएं, जब दायां पैर झुनझुनी हो तो अपनी बाईं हथेली को अपनी पूरी ताकत से घुमाएं।

 प्रस्तुति 
साक्षी 

गुरुबक्षणी निवास स्ट्रीट 5 रविग्राम तेलीबांधा धर्मशाला के सामने रायपुर 492006 छग 

Monday, October 18, 2021

समय अंतिम क्षण तक विद्यमान है

ये बात कई लोग आपसे कहेंगे कि समय से पहले और किस्मत से ज़्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता। पर कोई भी ये नहीं बताएगा कि समय कब है और किस्मत में क्या है। 

ये बात असल में सिर्फ धैर्य धारण करने सब्र रखने के लिए प्रेरित करती है वो भी तब जब आप पूरी तरह से प्रयास करके थक गए हों, हार मान चुके हों। 

कोई मुकेश अम्बानी, जेफ बेजोस, एलन मस्क को जाकर नहीं कहेगा कि भैया शांत हो जा, किस्मत से ज़्यादा और समय से पहले किसी को कुछ नहीं मिलता। 

भाग्यवादियों की ढाल है ये कथन और अक्सर कुछ हासिल नहीं होने पर ही कहा जाता है। समय और परिस्थितियों की अपनी महत्ता होती है इससे कोई इनकार नहीं है लेकिन इसे शुरू से ही अपने दिल दिमाग पर हावी रखना ठीक नहीं। 

कुछ अकर्मण्य लोग इसे अपने बचाव का जुमला बना लेते हैं, अपने प्रयासों की कमी छुपाने, अपनी असफलता की ज़िम्मेदारी लेने से बचने के लिए लोग अक्सर यही कहते फिरते हैं, कि हमने कोशिशें तो बहुत की पर किसी को भी समय से पहले और नसीब से ज़्यादा कुछ नहीं मिलता। 

ये बात हमेशा याद रखने वाली है कि 'समय' जीवन के आखरी क्षण तक है, और संभावनाएं भी अंतिम क्षण तक बनी रहेंगी। 

@मन्यु आत्रेय

Saturday, October 16, 2021

प्रेरक

बचपन में हर बात हमारे लिए कौतूहल का विषय होती है, सब कुछ नया होता है इसलिए विस्मयकारी और सुखद आश्चर्य से भरा हुआ होता है। उस समय हम बातों और चीजों के पीछे छुपी अपनी भूमिका को नहीं जानते। 

धीरे धीरे हम अपने आपको इन सब बातों के कर्ता के रूप में देखने लगते हैं, हमारा अहम बढ़ता है और फिर हर बात का आनंद खोता चला जाता है, मान अपमान हानि लाभ जय पराजय प्रतिस्पर्धा आदि बढ़ जाती है इसलिए आनंद समाप्त होता जाता है। 

हर बात को लेकर हमारे अंदर उसे पहले से जानने समझने की भावना हमे भीतर से विस्मित होने नहीं देती। कोई भी बात पुलक नहीं जगाती इसीलिए चीजों और बातों में वो आनंद नहीं रहता। 

इसका एक तरीका है जिसे हम विस्मृति कहते हैं। अपने पूर्व के अनुभवों को, स्मृतियों को कुछ देर के लिए परे रख कर, उनसे  मुक्ति पाकर हर बात को एक नए तरीके से देखना सीखना। 

उस एक क्षण में पूर्व की स्मृति से दूर होकर वर्तमान में जीना। अपने अनुभव को फिर उस एक क्षण में केंद्रित करना। हिसाब न करना, फिक्र न करना। छोटी छोटी चीजों में निहित आनंद को महसूस करना सीखना। 

यह याद रखना ज्ञान और अनुभव बहुत बार आनंद पर बट्टा काट लेता है। स्वयं को थोड़ी छूट दो, आनंद चक्रवृद्धि दर से बढ़ेगा। 

@ मन्यु आत्रेय




Friday, October 15, 2021

स्वाद ही नहीं फायदों में भी लाजवाब है पनीर*

*स्वाद ही नहीं फायदों में भी लाजवाब है पनीर* 
 
1 दांत और हड्डियों - पनीर का सबसे बेहतरीन लाभ है कि यह आपकी हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाता है साथ ही कैल्सीयम और फास्फोरस का एक बढ़िया स्त्रोत भी है। रोजाना पनीर का सेवन हड्डयिों की समस्या, जोड़ों में दर्द और दांत के रोगों से बचाए रखने में बेहद मददगार है।

2 मेटाबॉलिज्म - पाचन और पाचन तंत्र के लिए मेटाबॉलिज्म का रोल बहुत महत्वपूर्ण है। पनीर में अत्यधिक मात्रा में डायट्री फाइबर होते हैं जो भोजन के पाचन में बेहद मददगार साबित होता है। यह पाचन तंत्र के सुचारू रूप से चलने के लिए बेहद फायदेमंद और महत्वपूर्ण है।

3 कैंसर - पनीर का सबसे बड़ा लाभ यही है, इसमें कोई शक नहीं। हाल ही में हुए एक शोध में यह साबित हुआ है कि पनीर में कैंसर जनित कारणों और खतरों को कम करने की क्षमता है। पेट के कैंसर, कोलोन कैंसर और ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में पनीर बेहद प्रभावी साबित हुआ है।

4 डाइबिटीज - ओमेगा 3 से भरपूर पनीर डाइबिटीज से भी बेहद प्रभावी तरीके से लड़ता है। विशेषज्ञ डॉक्टरों का कहना है कि वे भी अपने डाइबिटीज रोगियों को रोजाना पनीर को डाइट में शा मिल करने की सलाह देते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है, कि पनीर दोनों टाइप के डाइबिटीज के लिए प्रभावी साबित होता है।

5 तुरंत एनर्जी - दूध से बनने के कारण पनीर में भी दूध के गुणों का भंडार है, जिनमें ऊर्जा का स्त्रोत भी शामिल है। शरीर में तुरंत ऊर्जा के लिए पनीर का सेवन फायदेमंद है।

प्रस्तुति - साक्षी 

गुरुबक्षणी निवास स्ट्रीट 5 रविग्राम तेलीबांधा धर्मशाला के सामने रायपुर छग 492006

Thursday, October 14, 2021

छोले पूड़ी सी नमकीन हलवे सी मीठी यादें...🙏

छोले पूड़ी सी नमकीन हलवे सी मीठी यादें...🙏
"तेरे पास कितने रुपये इकठ्ठे हुए"
"19"
हैं?????? 😲
"तो मेरे पास 18 कैसे हैं".... 😧
कौनसी आंटी ने नहीं बुलाया मुझे????

मन में ये सवाल पूरा दिन खनकता था उन सिक्कों की तरह...

50 पैसे, 1 रुपैया और किस्मत रईस होती तो वो 2 रुपए का गुलाबी सा नोट...

अगर नई नवेली गड्डी में से कड़कता नोट मिल जाता तो ख़ुशी युँ होती जैसे 100 रुपये का सौदा कर लाएंगे इससे....और कहीं लाल सुनहरी चुन्नी, प्लेट, मिल जाती तो हम देवी की तरह पूजी जाने कंजिकाओं को वो आंटी खुद "देवी" से कम न लगती थी... 👣🙏
सिक्कों का ये हिसाब किताब सुलझता नहीं कि कहीं से आवाज़ आ जाती आओ "कन्या " जल्दी आ जाओ.. और मन में एक और सिक्का बढ़ जाने की ख़ुशी फिर से पंख फैला लेती... 😄

पेट चने पूड़ी हलवे से ऐसा भरा हुआ के एक चना भी खाया तो पेट फूट जाए और न खायें तो रुपैया छूट जाए... 😉

"आंटी हम दोनों एक में ही खा लेंगे" कह कर दिल और पेट का वजन एडजस्ट करने की कोशिश कर लेते थे.... 😉

वो दो दिन बस हमारे होते थे "सिर्फ हमारे"
आज सिक्के बड़े नोट और गिफ्ट बन गए पर "कंजक और कंजिकाओं का मन" अब भी वही है 😃

वक़्त कितना गुजर गया
वो पहले जैसा बचपन का त्यौहार अब क्यों नहीं लौटकर आता।

🙏🏼जय माता दी🙏🏼

Sunday, October 10, 2021

बनिया

🤣 एक बनिए की फल फ्रूट की मशहूर दुकान थी
🍎🍐🍊🍓🍉
गर्मी में एक ग्राहक  उसकी दुकान पर तरबूज लेने आया🍉🍉🍉
ग्राहक ने कहा 
एक मीठा और लाल तरबूज 🍉🍉🍉 दे दो
😉
दुकानदार ने उसे एक तरबूज निकाल कर दे दिया
ग्राहक ने बोला लाल तो निकलेगा ना
दुकानदार ने कहा लाल कि पूरी गारंटी है नही तो वापस ले आना
🙄
ग्राहक 12:00 बजे तरबूज ले गया था दिन में 2:00 बजे तमतमाते हुए वापस आया और बोला 
आपने बोला था कि यह लाल और मीठा निकलेगा यह तो सफेद और फीका है
🙄
बनिए के पास उस समय बहुत ग्राहकों की भीड़ थी व्यापारी ने अपने मुख पर मुस्कान लाते हुए कहा की भाई साहब आप क्यों गुस्सा करते हैं मैं तो इसी तरबूज 🍉🍉🍉 को ढूंढ रहा था आज मैंने इसे बाहर से मंगाया था
😘
क्योंकि यह तरबूज तो शुगर फ्री तरबूज है और महंगा है परंतु यह गलती से आपके पास चल गया🙄 कोई बात नही आप दूसरा ले लीजिए 
🙄
ग्राहक सकपका गया और बोला की भाई साहब यह कितने रुपए किलो है
दुकानदार बोला भाई साहब है तो महंगा पर आपको चाहिए तो उसी रेट में ले जाओ।
ग्राहक खुश होते हुए बोला कि भाई साहब मुझे यही पैक करके दे दो 
😉
दुकानदार ने नौकर को बोला कि बेटा यह पैक कर दे
🙄
दुकान पर काम करता हुआ नौकर यह देखकर अचंभा कर गया कि फीका तरबूज भी उस ग्राहक को उसी रेट में पकड़ा दिया जिसे गारंटी दे कर दिया गया था और ग्राहक बहुत खुश होकर वापस गया।
😘 क्योंकि बनिया, बनिया होता है और ग्राहक संतुष्ट होता नही, करना पड़ता है 🙏
😁😁😁😁
😁😁😁😁😁