Wednesday, March 1, 2023

*31 मार्च को होगा अमर बलिदानी हेमू कालाणी जन्मशताब्दी समारोह का भव्य आयोजन*।*आर एस एस के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत होंगे शामिल।*

*31 मार्च को होगा अमर बलिदानी हेमू कालाणी जन्मशताब्दी समारोह का भव्य आयोजन*।
*आर एस एस के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत होंगे शामिल।*

*देश भर से बड़ी संख्या में जुटेगा सिन्धी समाज।*

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में अनगिनत क्रांतिकारियों ने अपना बलिदान दिया,इनमें कई ज्ञात व अज्ञात युवा क्रांतिकारी भी शामिल हैं। ऐसे ही एक युवा क्रांतिकारी के रूप में सिन्ध के सपूत हेमू कालाणी ने मात्र 19 वर्ष की अल्पायु में हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमते हुए,इंकलाब जिंदाबाद तथा भारत माता की जय के नारे लगाते हुए अपना जीवन माँ भारती के चरणों में बलिदान कर दिया। उस वीर युवा क्रांतिकारी का यह जन्मशताब्दी वर्ष चल रहा है जिसके अंतर्गत देश भर में  अमर बलिदानी हेमू कालाणी जी को समर्पित विभिन्न आयोजन किये जा रहे हैं, उसी श्रंखला में आगामी 31 मार्च 2023 को भोपाल स्थित लाल परेड मैदान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परमपूज्यनीय सरसंघचालक डॉ.मोहनराव भागवत जी की गौरवमयी उपस्थिति में एक भव्य आयोजन होने जा रहा है।
इसके पूर्व,23 मार्च 2022 से आरम्भ हुए जन्मशताब्दी वर्ष में दौरान भारतीय सिन्धू सभा तथा समाज की विभिन्न संस्थाओं द्वारा देश भर में सतत कई आयोजन किये गए जिनमे से कुछ प्रमुख आयोजन निम्नानुसार हैं।
1-राजस्थान प्रान्त में शहीद रथ यात्रा निकाली गई।
2-गुजरात मे खेल आयोजन किये गए।
3--महाराष्ट्र में संगोष्ठियों के आयोजन हुए।
4--छत्तीसगढ़ में नाट्य मंचन तथा संगोष्ठियां आयोजित हुईं।
5--मध्यप्रदेश के विभिन्न शहरों में काव्य गोष्ठियां तथा अन्य सांस्कृतिक आयोजन हुए।
6--दिल्ली व उत्तरप्रदेश में कई नगरों में युवाओं से सम्बंधित आयोजन संपन्न हुए।
7--पश्चिम बंगाल, कर्नाटक व उड़ीसा में रचनात्मक कार्यक्रम आयोजित किये गए।
31 मार्च 2023 को भोपाल में होने जा रहे राष्ट्रीय स्तर के इस आयोजन में मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र,गुजरात, दिल्ली, छत्तीसगढ़ सहित दक्षिण भारत से एक लाख से अधिक की संख्या में समाजजन को आमंत्रित किया गया है।
इस समारोह में देश भर से सिन्धी समाज के संतजन को भी आशीर्वाद देने हेतु आमंत्रित किया गया है,अभी तक जिन सन्तों की स्वीकृति प्राप्त हुई है उनमें महामंडलेश्वर साईं हंसराम जी (भीलवाड़ा), अखिल भारत सिन्धु सन्त समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष साईं खिम्यादास जी (सतना), महामंत्री साईं हँसदास जी (रीवा), शदाणी दरबार के गद्दीनशीन साईं युधिष्ठिरलाल जी (रायपुर), वसणशाह दरबार(कल्याण) से साईं कालीराम जी,साईं डॉ. सन्तोषदास जी (अमरावती), सन्त कंवरराम आश्रम के गद्दीनशीन साईं राजेश लाल जी (अमरावती), प्राचीन श्री झूलेलाल मन्दिर भरूच से ठकुर मनीषलाल जी,शिव शांति आश्रम लखनऊ से साईं मोहनलाल जी प्रमुख हैं।इनके अलावा विभिन्न क्षेत्रों जैसे न्यायिक सेवा,अखिल भारतीय प्रशासनिक एवं पुलिस सेवा,राजनीति,शिक्षा, कला,संगीत,साहित्य,फ़िल्म जगत,उद्योग जगत में ख्याति अर्जित कर चुके सिन्धी समाज के विशिष्टजन को भी इस कार्यक्रम में आमंत्रित किया जा रहा है।
इस भव्य समारोह में देश भर से शामिल हो रहे समाजजन जहां एक ओर स्वाधीनता के महासमर के नायक शेरे-सिन्ध हेमू कालाणी का पावन स्मरण कर उन्हें श्रद्धांजली अर्पित करेंगे तो वहीं स्वाधीनता संग्राम में सिन्ध के योगदान पर आयोजित प्रदर्शनी के माध्यम से हेमू कालाणी व सिन्ध के अन्य क्रांतिकारियों के गौरवशाली इतिहास से भी रूबरू होंगे,साथ ही एक अन्य प्रदर्शनी के माध्यम से सिन्ध के प्रमुख नगरों एवं विभिन्न दर्शनीय स्थानों को भी आकर्षक ढंग से प्रदर्शित किया जाएगा।इस अवसर पर  सिन्धी व्यंजनों के स्टॉल निश्चित ही सभी के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहेंगे।
इस अवसर पर सिन्ध के स्वतंत्रता सेनानियों पर केंद्रित एक स्मारिका का विमोचन भी किया जाएगा।
 हमारा प्रयास यह भी है कि अमर बलिदानी हेमू कालाणी जन्मशताब्दी समारोह के अंतर्गत हो रहे इस भव्य आयोजन के माध्यम से सिन्ध के गौरवशाली व समृद्ध इतिहास,स्वाधीनता की लड़ाई में सिन्ध के योगदान के साथ ही सिन्धी साहित्य, सिन्धी वेशभूषा, सिन्धी खान-पान के भव्य प्रदर्शन से युवा पीढ़ी को सिन्ध व सिन्धियत की न केवल विस्तृत जानकारी प्राप्त हो बल्कि इस सबको देखकर उसे गौरव का अनुभव भी हो साथ ही युवा पीढ़ी हेमू कालाणी व उन जैसे अनेक वीर क्रांतिकारियों की जानकारी प्राप्त कर उनसे प्रेरणा ले।

Tuesday, June 21, 2022

प्राचीन योग रहे शरीर हमेशा दुरुस्त

*इक्साइज़ को योग न मानिए प्राचीन योग को अपनाइए जीवन सुखमय बनाइए*:- योगगुरु धीरज
वशिष्ठ योग  के प्रणेता योग गुरु धीरज जी ने   रायपूर वासियो मे एक सही सनातन योग का बीज का रोपण किया, आज का योग  कैसे व्यायाम मे परिवर्तित कर परोसा जा रहा है जो थकाता है और ऊर्जाहीन बना रहा है ।उन्होंने लोगों से अपील की जो योग हमारे ऋसी मुनियो ने हमें दिया सरल और असरदार योग उसे अपनायें जिसका लाभ स्थाई होगा जबकि आज योग में भी मिलावट कर दी गई योग के नाम से व्यायाम करवाया जा रहा है जो  शरीर के लिए फ़ायदेमंद नहीं है 
इस  अंतराष्ट्रीय योग दिवस में  दो दिवसीय शिविर का आयोजन बीटीआई ग्राउंड में किया गया जिसका आयोजन वशिष्ठ योग छत्तीसगढ़ शंकरनगर शांतिनगर पूज्य सिंधी पंचायत एवं सुहिणी सोच द्वारा किया गया ।
विधायक कुलदीप जुनेजा आज के मुख्य अतिथ थे जिन्होने  योग गुरू धीरज जी एवं सभी आयोजक का सम्मान किया ।
आज भी कार्यक्रम स्थल खचाखच भरा हुआ था आज योग शिविर में लोगों ने अपने अनुभव भी बताए जिन्होंने इस योग को ही सही योग माना और योगगुरु धीरज जी के प्रति आभार व्यक्त किए आज आयोजक एवं सहयोगी संस्थाओं का सम्मान किया गया जिसने मुख्य रूप से वशिष्ठ योग छत्तीसगढ़ शंकरनगर शांतिनगर पूज्य सिंधी पंचायत सुहिणी सोच बढ़ते कदम भारतीय सिंधु सभा मोटवानी परिवार एवं सीए चेतन तारवानी का विशेष रूप से सम्मान किया गया ।
इसी योग  की परिचर्चा कल 22 ज़ुन को सिंधु पैलेस में होगी जिसने आमंत्रित किए गए है योग के क्षेत्र मे काम करने वाले योग संगठन,योग साधक जन ,रायपूर के विभिन्न महाविद्यालय,विश्व विद्यालय के योग विद्यार्थि सामाजिक कार्यकर्ता  जन। योग  के परिचर्चा योग गरू धीरज के संग 12 बजे से 5 बजे तक होगा ।
आज दो दिवसीय योग शिविर का समापन हुआ लेकिन सभी से अपील की है नियमित रूप से योग करे तथा जानकारी दी गई की सिंधु पैलेस में निशुल्क योग क्लास का आयोजन नियमित रूप से होता प्रतिदिन सुबह 6.30 बजे जिसमें कोई व्यक्ति सहभागी बन सकता है कार्यक्रम का संचालन सीए चेतन तारवानी ने किया एवं धन्यवाद ज्ञापन मुरली धर शादीजा ने किया जो की कार्यक्रम संयोजक है साथ में अनिता लढहा जी एवं योगगुरु गिरीश आहूजा के मर्गदर्शन में शिविर का आयोजन हुआ ।

प्राणायाम शरीर के लिए ब्रह्मास्त्र - चेतन तारवानी

*वशिष्ठ प्राणायाम से शरीर को रिलैक्स करने के साथ आक्सीजन का भंडार देता अनिद्रा की बीमारी समाप्त करता है* :- योगगुरु धीरज 


वशिष्ठ योग सही प्राचीन सनातन योग के प्रणेता योग गुरु धीरज जी ने  कहा की साधना ही परम है
सही योग जीवन में रूपांतरण  करता है उन्होंने योग की बारीकियों को बताया सही योग करवाया जैसे हस्तोत्तन आसान अधोमुख स्वान आसान वशिष्ठ प्राणायाम जो वशिष्ठ योग की देन हे जिसे सभी व्यक्ति आसानी से कर सकते हे 
ऑक्सीजन का भंडार  हे यह करोना में संजीवनी बना अनिद्रा वालो के लिए नीद की दवा हे ये आसन तथा यह सासो की लम्बाई बड़ाकर रिलेक्स करता है  शरीर  को ।
कार्यक्रम का प्रारम्भ दीप जला कर किया गया जिसमें मुख्य रूप से युगगुरु धीरज गुरुमाँ अंकिता जी गिरीश आहूजा मुरलीधर शादीजा अनिता लढा अशोक मखीजा एवं चेतन तारवानी उपस्थित थे 
पुष्पहार से योगगुरु धीरज एवं गुरुमाँ अंकिता का स्वागत किया स्वागत भाषण योगगुरु गिरीश आहूजा ने दिया पूरा ग्राउंड खचाखच भरा हुआ था साधकों ने उत्सव के रूप में मनाया कार्यक्रम में विशेष रूप से पूज्य शदाणी दरबार तीर्थ के पिठाधिश संत डॉ. युधिस्ठिर लाल जी उपस्थित हुए उन्होंने आयोजक टीम वशिस्ठ योग छत्तीसगरग शंकरनगर शांतिनगर पूज्य सिंधी पंचायत एवं सुहिणी  सोच को बधाइयाँ एवं शुभकामनाये दिए ।कार्यक्रम का संचालन सीए चेतन तारवानी ने किया

Thursday, November 18, 2021

सुनील बजाज समाज सेवा के लिए बढ़ते कदम संस्था द्वारा सम्मानित

समाज सेवी सुनील बजाज को बढ़ते कदम संस्था द्वारा मानव सेवा के कार्य के लिए पिछले दिनों सादे समारोह में सम्मानित किया गया। इस अवसर पर संस्था के अध्यक्ष सहित अन्य समाज सेवी उपस्थित थे।

Tuesday, November 2, 2021

सुहिणी सोच महिलाओं में आत्मविश्वास भर देता है जिससे वे अपने लक्ष्य के लिए उड़ान भरती है* :- मनीषा तारवानी


*सुहिणी सोच कर रही है महिलाओं में भाषा संस्कृति आत्मविश्वास एवं नेतृत्व कला का विकास*:- संत युधिस्ठिर लाल
*पूज्य शदाणी दरबार तीर्थ में सुहिणी सोच सदस्यों का हुआ सम्मान*
*सुहिणी सोच महिलाओं में आत्मविश्वास  भर देता है जिससे वे अपने लक्ष्य के लिए उड़ान भरती है* :- मनीषा तारवानी

सुहिणी सोच संस्था के बहुरानी सम्मेलन कार्यक्रम को सफल बनाने हेतु जिन सदस्यों ने अपना कीमती योगदान दिया उन सभी सदस्यों का शदाणी दरबार के पूज्य संत साईं श्री युधिष्ठिर लाल जी एवं भाभी मां दीपिका के कर कमलों द्वारा सुहिणी  सोच का स्मृति चिन्ह देकर सम्मान किया गया। यह सम्मान समारोह    पूज्य शदाणी दरबार तीर्थ में किया गया।
बहुरानी सम्मेलन जो पं. दिन दयाल उपाध्याय आडोटोरिम में आयोजित हुआ था का मुख्य उद्देश्य अपने संस्कार, संस्कृति, रीति रिवाज, सभ्यता और भाषा को बढ़ावा देकर उसे कायम रखना और नए रिश्तो में मधुरता और सामंजस्य बनाने में बहू बेटियों को उनकी भूमिका से परिचित एवं जागृत कराना क्योंकि इन्हीं से नई पीढ़ी का निर्माण होता है। जिन सदस्यों को सम्मानित किया गया उनके नाम इस प्रकार हैं काजल लालवानी, कृतिका बजाज, नेहा अस्पालिया, मुस्कान लालवानी, पल्लवी चिमनानी, विद्या गंगवानी, जूही दरयानी, डॉ.नीलिमा आहूजा, साक्षी माखीजा, ज्योति बुधवानी, संगीता पुरी, रेखा पंजवानी, शालिनी पृथ्यानी, रिद्धि मोरयानी, वंशिका पिंजानी, सुमन पाहुजा, सोनिया इसरानी, सुनीता नागरानी, पलक कुकरेजा, पूनम बजाज, दीक्षा बुधवानी, महिमा लाहोरी, एकता जसवानी, लक्ष्मी चँचलानी, आरती मयानी, गीता गुरनानी, श्रेया सुंदरानी, भूमि सुंदरानी, आरती कोडवानी, करिश्मा कमलानी, सोनम माधवानी, सिया जसवानी, सोनिया कुकरेजा, सरिता आहूजा, सरिता रामानी, ख़ुशी सोनी, नेहा पंजवानी, हर्षा भावनानी,  डॉ. तमन्ना जसवानी, सृष्टि मिरघानी, सोनिया गंगवानी, कंचन डेंगवानी, हर्षा सिहानी, वंशिका प्रितवानी एवं रौनक वासवानी।
संत साईं श्री युधिष्ठिर लाल जी ने अपने आर्शीवचन में कहा कि जैसा संस्था का नाम है वैसे ही इनके काम है उन्होंने कार्यक्रम की सफलता की बधाई दी एवं संगठन की एकता के महत्व को भी समझाया और कहा सुहिणी सोच कर रही है महिलाओं में भाषा संस्कृति आत्मविश्वास एवं नेतृत्व कला का विकास जो आज समाज की ज़रूरत भी है 
संस्था की संस्थापक मनीषा तारवानी ने कार्यक्रम की सफलता का श्रेय अपनी टीम को देते हुए कहा कि टीम के सहयोग से ही यह प्रदेश स्तरीय कार्यक्रम सफल हो पाया। उन्होंने साईं युधिष्ठिर लाल जी को भी इस कार्यक्रम में सहयोग देने के लिए हार्दिक धन्यवाद दिया और कहा कि साईं की आशीर्वाद से ही सुहिणी सोच महिलाओं में आत्मविश्वास  भर देता है जिससे वे अपने लक्ष्य के लिए उड़ान भरती है।
संस्थापक मनीषा तारवानी एवं सचिव माही बुलानी को संत श्री साईं युधिष्ठिर लाल जी ने अपनी तरफ से उपहार देकर विशेष रूप से सम्मानित किया।

प्रेस विज्ञप्ति सुहिणी सोच की मीडिया प्रभारी ज्योति बुधवानी के द्वारा जारी की गई।

*ज्योति बुधवानी*
93039 09300
मीडिया प्रभारी

Wednesday, October 27, 2021

सितार के जादूगर 'उस्ताद रईस खान' का ये सितारवादन चमत्कार से कम नहीं ।

फ़िल्म मेरा साया (1966) के लोकप्रिय गीत 'नैनों में बदरा छाए बिजली सी चमके हाये' के शुरुवात में बजा मनमोहक सितार हो या फ़िल्म पाकीज़ा (1972) में रेल की सिटी बजने के साथ ही सितार वादन जो मुख्य अभिनेत्री मीना कुमारी की मनोदशा को दर्शाता है । 
जो श्रोताओं व दर्शकों  का ध्यान आकर्षित करता है । सितार के जादूगर 'उस्ताद रईस खान' का ये सितारवादन चमत्कार से कम नहीं ।

शास्त्रीय संगीत के मेवात घराने के विख्यात सितार वादक उस्ताद रईस खान , गग्घे नज़ीर खान के भाई उस्ताद वाहिद खान के परिवार से थे । पिता उस्ताद मोहम्मद खान उनके गुरु रहे । जो स्वयं सितार वादक,बीनकार, रुद्रवीणा और सुरबहार के उस्ताद थे ।
इंदौर(म.प्र.) में 25 नवंबर 1939 में जन्मे । बड़े भोपाल में हुए और सेंट ज़ेवियर,मुम्बई में उच्च शिक्षा प्राप्त  की । रईस खान साहब का व प्रख्यात हिंदी फिल्मों के संगीतकार मदन मोहन का साथ कई वर्षों का  रहा । 
उस्ताद रईस खान और संगीतकार मदनमोहन का साथ हुआ पहली फ़िल्म पूजा के फूल ('64) गीत था 'मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है ' । 
उस्ताद जी के सितार ने ऐसा सुरीलापन पैदा किया कि मदनमोहन उनके मुरीद हो गए ।
मदन मोहन के संगीत में उस्ताद रईस खान के सितार की बहार देखिये 
फ़िल्म ग़ज़ल('64) की खूबसूरत रचना 'नगमा ओ शेर की सौगात किसे पेश करूँ'(लता)
फ़िल्म 'दुल्हन एक रात की' का मधुर गीत 'मैंने रंग ली आज चुनरिया ' और 'सपनों में अगर मेरे तुम आओ तो सो जाऊं' (लता) 
फ़िल्म 'नौनिहाल'('67) में रफी साहब के गाये गीत 'तुम्हारी जुल्फ के साये में शाम कर लूंगा' सितार अन्य वाद्यों से अलग सुनाई देता है ।
1969 में प्रदर्शित फ़िल्म 'चिराग़' का लता जी का गाया गीत 'छाई बरखा बहार पड़े अंगना फुहार' में गीत के मध्य सितार की लय ।
अन्य गीत की बानगी भी देखिए जिनमें सितार का प्रयोग गीत की मधुरता को चार चाँद लगा देता है 
हीर राँझा('70) का गीत 'दो दिल टूटे दो दिल हारे'
दस्तक('70) - हम हैं मता ए कूचा बाजार की तरह और बैयाँ ना धरो बलमा
हंसते जख्म('73) - आज सोचा तो आंसू भर आये
दिल की राहें('73) - रस्म ए उल्फत को निभाएं तो निभाएं कैसे 
इसके अलावा नौशाद ,शंकर जयकिशन ,लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ,ओ. पी. नैयर,जयदेव,कल्याणजी आनंदजी के संगीत में रचे गीतों को मधुर बनाया ।
राग भीमपलासी में बने 'मेरा साया' (1966) के गीत 'नैनों में बदरा छाए' में आरम्भिक व  गीत के मध्य सितार की धुन, 'गंगा जमना' के गीत' ढूँढो ढूँढो रे साजना' के मध्य में सितार का शानदार प्रयोग, पाकीज़ा में पार्श्व संगीत में जहां भी सितार का प्रयोग है वो सभी उस्ताद रईस खान साहब का ही है ।
मदन मोहन व लताजी का साथ सर्वविदित है किंतु रईस खान साहब का योगदान उनके गीतों को सजाने,सँवारने व ऊंचाइयों पर ले जाने में कम न रहा।
इमदादखान(इटावा) घराने के सितारवादक उस्ताद विलायत खान मदन मोहन के मित्रों में थे । यही कारण रहा कि उनके भानजे रईस खान उनसे जुड़े और एक लंबे समय तक जुड़ाव रहा । एक समय ऐसा भी समय आया कि छोटी गलतफहमी की वजह से दोनों का साथ टूट गया जिससे सितार का प्रयोग मदन मोहन की फिल्मों में बंद हो गया । उनकी बाद कि वर्ष '74, '75 की फिल्मों मौसम, हिंदुस्तान की कसम,लैला मजनू,साहिब बहादुर में देखा जा सकता है । जिसके गीतों में  सितार का प्रयोग नहीं किया गया ।
मृत्युपर्यन्त कला को समर्पित उस्ताद रईस खान पाकिस्तान की प्रसिद्ध गायिका बिल्किश खानम से विवाह पश्चात 1986 में पाकिस्तान चले गए। पाकिस्तान के राष्ट्रपति द्वारा वर्ष 2005 में प्राइड ऑफ परफॉरमेंस (Pride Of Performance) एवं पाकिस्तान के तीसरे सर्वोच्च नागरिक अवार्ड सितारा-ए-इम्तियाज़ से वर्ष 2017 में नवाज़ा गया । ये ऐसे पहले पाकिस्तानी कलाकार रहे जिन्होंने 2012 में भारतीय संसद में कला का प्रदर्शन किया ।
शंकर जयकिशन के नवोन्मेषी जैज़ संगीत एल्बम 'रागा- जैज़ स्टाइल' में भी इनका योगदान रहा । भारतीय रागों पर आधारित इस ग्यारह गीतों के इस एल्बम में sexophone, ट्रम्पेट,सितार ,तबला का सफल प्रयोग किया गया था ।
उनके सितार के उत्कृष्ट प्रयोग कई
हिंदी फिल्मों में रहे जिनमें प्रमुख हैं-
ढूँढो ढूँढो से साजना- 
गंगा जमना(1961)
आप यूँ ही अगर हमसे मिलते रहे - एक मुसाफिर एक हसीना('62)
इशारों इशारों में दिल लेने वाले- कश्मीर की कली('64)
ओ मेरे सनम ओ मेरे सनम- संगम(1964)
जाइये आप कहाँ जाएंगे - मेरे सनम('65)
बहारों मेरा जीवन भी सँवारो- आखिरी खत('66)
तुम्हे याद करते करते - आम्रपाली('66)
फिर मिलोगे कभी इस बात का वादा कर लो- 
ये रात फिर ना आयेगी(1966)
सजनवा बैरी हो गए हमार- 
तीसरी कसम(1967)
चंदन सा बदन चंचल चितवन- सरस्वती चन्द्र('68)
इतना तो याद है मुझे - महबूब की मेंहदी('71)
'तुम जो मिल गए हो'-
 हँसते ज़ख्म(1973)
मेरी सांसो को जो महका रही है - बदलते रिश्ते(1978)
इसके अलावा फिल्म सत्यम शिवम सुंदरम('78) के सभी गीतों में उस्तादजी के सितार का मधुरतम उपयोग संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने किया ।

इस महान साधक की मृत्यु लंबी बीमारी के बाद कराची(पाकिस्तान) में 6 मई 2017 को सतहत्तर की आयु में हुई।

Vimal Joshi

Tuesday, October 26, 2021

ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में अंतर :------

ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में  अंतर :------

भारत में प्राचीन काल से ही ऋषि मुनियों का बहुत महत्त्व रहा है। ऋषि मुनि समाज के पथ प्रदर्शक माने जाते थे और वे अपने ज्ञान और साधना से हमेशा ही लोगों और समाज का कल्याण करते आये हैं। आज भी वनों में या किसी तीर्थ स्थल पर हमें कई साधु देखने को मिल जाते हैं। धर्म कर्म में हमेशा लीन रहने वाले इस समाज के लोगों को ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी आदि नामों से पुकारते हैं। ये हमेशा तपस्या, साधना, मनन के द्वारा अपने ज्ञान को परिमार्जित करते हैं। ये प्रायः भौतिक सुखों का त्याग करते हैं हालाँकि कुछ ऋषियों ने गृहस्थ जीवन भी बिताया है। आईये आज के इस पोस्ट में देखते हैं ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में कौन होते हैं और इनमे क्या अंतर है ?

ऋषि कौन होते हैं

भारत हमेशा से ही ऋषियों का देश रहा है। हमारे समाज में ऋषि परंपरा का विशेष महत्त्व रहा है। आज भी हमारे समाज और परिवार किसी न किसी ऋषि के वंशज माने जाते हैं। 

ऋषि वैदिक परंपरा से लिया गया शब्द है जिसे श्रुति ग्रंथों को दर्शन करने वाले लोगों के लिए प्रयोग किया गया है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है वैसे व्यक्ति जो अपने विशिष्ट और विलक्षण एकाग्रता के बल पर वैदिक परंपरा का अध्ययन किये और विलक्षण शब्दों के दर्शन किये और उनके गूढ़ अर्थों को जाना और प्राणी मात्र के कल्याण हेतु उस ज्ञान को लिखकर प्रकट किये ऋषि कहलाये। ऋषियों के लिए इसी लिए कहा गया है "ऋषि: तु मन्त्र द्रष्टारा : न तु कर्तार : अर्थात ऋषि मंत्र को देखने वाले हैं न कि उस मन्त्र की रचना करने वाले। हालाँकि कुछ स्थानों पर ऋषियों को वैदिक ऋचाओं की रचना करने वाले के रूप में भी व्यक्त किया गया है। 

ऋषि शब्द का अर्थ

ऋषि शब्द "ऋष" मूल से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ देखना होता है। इसके अतिरिक्त ऋषियों के प्रकाशित कृत्य को आर्ष कहा जाता है जो इसी मूल शब्द की उत्पत्ति है। दृष्टि यानि नज़र भी ऋष से ही उत्पन्न हुआ है। प्राचीन ऋषियों को युग द्रष्टा माना जाता था और माना जाता था कि वे अपने आत्मज्ञान का दर्शन कर लिए हैं। ऋषियों के सम्बन्ध में मान्यता थी कि वे अपने योग से परमात्मा को उपलब्ध हो जाते थे और जड़ के साथ साथ चैतन्य को भी देखने में समर्थ होते थे। वे भौतिक पदार्थ के साथ साथ उसके पीछे छिपी ऊर्जा को भी देखने में सक्षम होते थे। 

ऋषियों के प्रकार

ऋषि वैदिक संस्कृत भाषा से उत्पन्न शब्द माना जाता है। अतः यह शब्द वैदिक परंपरा का बोध कराता है जिसमे एक ऋषि को सर्वोच्च माना जाता है अर्थात ऋषि का स्थान तपस्वी और योगी से श्रेष्ठ होता है। अमरसिंहा द्वारा संकलित प्रसिद्ध संस्कृत समानार्थी शब्दकोष के अनुसार ऋषि सात प्रकार के होते हैं ब्रह्मऋषि, देवर्षि, महर्षि, परमऋषि, काण्डर्षि, श्रुतर्षि और राजर्षि। 

सप्त ऋषि

पुराणों में सप्त ऋषियों का केतु, पुलह, पुलत्स्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ठ और भृगु का वर्णन है। इसी तरह अन्य स्थान पर सप्त ऋषियों की एक अन्य सूचि मिलती है जिसमे अत्रि, भृगु, कौत्स, वशिष्ठ, गौतम, कश्यप और अंगिरस तथा दूसरी में कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, भरद्वाज को सप्त ऋषि कहा गया है। 

मुनि किसे कहते हैं

मुनि भी एक तरह के ऋषि ही होते थे किन्तु उनमें राग द्वेष का आभाव होता था। भगवत गीता में मुनियों के बारे में कहा गया है जिनका चित्त दुःख से उद्विग्न नहीं होता, जो सुख की इच्छा नहीं करते और जो राग, भय और क्रोध से रहित हैं, ऐसे निस्चल बुद्धि वाले संत मुनि कहलाते हैं। 

मुनि शब्द मौनी यानि शांत या न बोलने वाले से निकला है। ऐसे ऋषि जो एक विशेष अवधि के लिए मौन या बहुत कम बोलने का शपथ लेते थे उन्हीं मुनि कहा जाता था। प्राचीन काल में मौन को एक साधना या तपस्या के रूप में माना गया है। बहुत से ऋषि इस साधना को करते थे और मौन रहते थे। ऐसे ऋषियों के लिए ही मुनि शब्द का प्रयोग होता है। कई बार बहुत कम बोलने वाले ऋषियों के लिए भी मुनि शब्द का प्रयोग होता था। कुछ ऐसे ऋषियों के लिए भी मुनि शब्द का प्रयोग हुआ है जो हमेशा ईश्वर का जाप करते थे और नारायण का ध्यान करते थे जैसे नारद मुनि। 

मुनि शब्द का चित्र,मन और तन से गहरा नाता है। ये तीनों ही शब्द मंत्र और तंत्र से सम्बन्ध रखते हैं। ऋग्वेद में चित्र शब्द आश्चर्य से देखने के लिए प्रयोग में लाया गया है। वे सभी चीज़ें जो उज्जवल है, आकर्षक है और आश्चर्यजनक है वे चित्र हैं। अर्थात संसार की लगभग सभी चीज़ें चित्र शब्द के अंतर्गत आती हैं। मन कई अर्थों के साथ साथ बौद्धिक चिंतन और मनन से भी सम्बन्ध रखता है। अर्थात मनन करने वाले ही मुनि हैं। मन्त्र शब्द मन से ही निकला माना जाता है और इसलिए मन्त्रों के रचयिता और मनन करने वाले मनीषी या मुनि कहलाये। इसी तरह तंत्र शब्द तन से सम्बंधित है। तन को सक्रीय या जागृत रखने वाले योगियों को मुनि कहा जाता था।

जैन ग्रंथों में भी मुनियों की चर्चा की गयी है। वैसे व्यक्ति जिनकी आत्मा संयम से स्थिर है, सांसारिक वासनाओं से रहित है, जीवों के प्रति रक्षा का भाव रखते हैं, अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, ईर्या (यात्रा में सावधानी ), भाषा, एषणा(आहार शुद्धि ) आदणिक्षेप(धार्मिक उपकरणव्यवहार में शुद्धि ) प्रतिष्ठापना(मल मूत्र त्याग में सावधानी )का पालन करने वाले, सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव, वंदन, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायतसर्ग करने वाले तथा केशलोच करने वाले, नग्न रहने वाले, स्नान और दातुन नहीं करने वाले, पृथ्वी पर सोने वाले, त्रिशुद्ध आहार ग्रहण करने वाले और दिन में केवल एक बार भोजन करने वाले आदि 28 गुणों से युक्त महर्षि ही मुनि कहलाते हैं। 

मुनि ऋषि परंपरा से सम्बन्ध रखते हैं किन्तु वे मन्त्रों का मनन करने वाले और अपने चिंतन से ज्ञान के व्यापक भंडार की उत्पति करने वाले होते हैं। मुनि शास्त्रों का लेखन भी करने वाले होते हैं 

साधु कौन होते हैं 

किसी विषय की साधना करने वाले व्यक्ति को साधु कहा जाता है। प्राचीन काल में कई व्यक्ति समाज से हट कर या कई बार समाज में ही रहकर किसी विषय की साधना करते थे और उस विषय में विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करते थे। विषय को साधने या उसकी साधना करने के कारण ही उन्हें साधु कहा गया। 

कई बार अच्छे और बुरे व्यक्ति में फर्क करने के लिए भी साधु शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसका कारण है कि सकारात्मक साधना करने वाला व्यक्ति हमेशा सरल, सीधा और लोगों की भलाई करने वाला होता है। आम बोलचाल में साध का अर्थ सीधा और दुष्टता से हीन होता है। संस्कृत में साधु शब्द से तात्पर्य है सज्जन व्यक्ति। लघुसिद्धांत कौमुदी में साधु का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि "साध्नोति परकार्यमिति साधु : अर्थात जो दूसरे का कार्य करे वह साधु है। साधु का एक अर्थ उत्तम भी होता है ऐसे व्यक्ति जिसने अपने छह विकार काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर का त्याग कर दिया हो, साधु कहलाता है। 

साधु के लिए यह भी कहा गया है "आत्मदशा साधे " अर्थात संसार दशा से मुक्त होकर आत्मदशा को साधने वाले साधु कहलाते हैं। वर्तमान में वैसे व्यक्ति जो संन्यास दीक्षा लेकर गेरुआ वस्त्र धारण करते हैं और जिनका मूल उद्द्येश्य समाज का पथ प्रदर्शन करते हुए धर्म के मार्ग पर चलते हुए मोक्ष को प्राप्त करते हैं, साधु कहलाते हैं। 

संन्यासी किसे कहते हैं

सन्न्यासी धर्म की परम्परा प्राचीन हिन्दू धर्म से जुडी नहीं है। वैदिक काल में किसी संन्यासी का कोई उल्लेख नहीं मिलता। सन्न्यासी या सन्न्यास की अवधारणा संभवतः जैन और बौद्ध धर्म के प्रचलन के बाद की है जिसमे सन्न्यास की अपनी मान्यता है। हिन्दू धर्म में आदि शंकराचार्य को महान सन्न्यासी माना गया है। 

सन्न्यासी शब्द सन्न्यास से निकला हुआ है जिसका अर्थ त्याग करना होता है। अतः त्याग करने वाले को ही सन्न्यासी कहा जाता है। सन्न्यासी संपत्ति का त्याग करता है, गृहस्थ जीवन का त्याग करता है या अविवाहित रहता है, समाज और सांसारिक जीवन का त्याग करता है और योग ध्यान का अभ्यास करते हुए अपने आराध्य की भक्ति में लीन हो जाता है। 

हिन्दू धर्म में तीन तरह के सन्न्यासियों का वर्णन है

परिव्राजकः सन्न्यासी : भ्रमण करने वाले सन्न्यासियों को परिव्राजकः की श्रेणी में रखा जाता है। आदि शंकराचार्य और रामनुजनाचार्य परिव्राजकः सन्यासी ही थे। 

परमहंस सन्न्यासी : यह सन्न्यासियों की उच्चत्तम श्रेणी है। 

यति : सन्यासी : उद्द्येश्य की सहजता के साथ प्रयास करने वाले सन्यासी इस श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। 

वास्तव में संन्यासी वैसे व्यक्ति को कह सकते हैं जिसका आतंरिक स्थिति स्थिर है और जो किसी भी परिस्थिति या व्यक्ति से प्रभावित नहीं होता है और हर हाल में स्थिर रहता है। उसे न तो ख़ुशी से प्रसन्नता मिलती है और न ही दुःख से अवसाद। इस प्रकार निरपेक्ष व्यक्ति जो सांसारिक मोह माया से विरक्त अलौकिक और आत्मज्ञान की तलाश करता हो संन्यासी कहलाता है। 

उपसंहार

ऋषि, मुनि, साधु या फिर संन्यासी सभी धर्म के प्रति समर्पित जन होते हैं जो सांसारिक मोह के बंधन से दूर समाज कल्याण हेतु निरंतर अपने ज्ञान को परिमार्जित करते हैं और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हेतु तपस्या, साधना, मनन आदि करते हैं।