Monday, February 22, 2010

क्या प्रतिभा एक तरह का पागलपन है ?--------rajshekhar






इस संसार में जब भी सच्ची प्रतिभा का जन्म होता है, उसे हम केवल इसी एक संकेत से पहचान सकते हैं कि दुनिया के सारे मूर्ख उसके खिलाफ एकजुट हो गए हैं इस संसार में जब भी सच्ची प्रतिभा का जन्म होता है, उसे हम केवल इसी एक संकेत से पहचान सकते हैं कि दुनिया के सारे मूर्ख उसके खिलाफ एकजुट हो गए हैं kaई बार मनुष्य ऐसी स्थितियों में पड़ जाता है जिनसे मुक्ति पाने के लिए उसका थोड़ा-थोड़ा पागल होना भी जरूरी हो जाता है ।
वैसे इस संसार में जब भी कभी सच्ची प्रतिभा का जन्म होता है, उसे हम केवल इसी एक संकेत से पहचान सकते हैं कि संसार के सारे मूर्ख उसके खिलाफ एकजुट हो गए हैं । तो क्या प्रतिभा एक प्रकार का पागलपन है ? हजरत मोहम्मद, ईसा, बुद्ध, महावीर, सुकरात, अरस्तू, रजनीश, निराला या बेचन शर्मा "उग्र" कोई नाम ऐसा नहीं है जिसे कभी पागल समझा या कहा न गया हो ।
निराला को तत्कालीन हिंदी साहित्य में सक्रिय कई लोगों ने तो पागल घोषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी । उन्होंने स्वयं अपने अंतिम दिनों में हिंदी बोलनी तक छोड़ दी थी । अज्ञेय ने अपनी पुस्तक "स्मृतिलेखा" में लिखा है कि जब वे निराला से मिलने गए तो उन्होंने उनसे कहा, "निराला इज डेड।" हालांकि अपनी कविता सुनाने की मांग पर वे रो पड़े । इतना ही नहीं, महाकवि ने जो खाना अपने लिए बनवाया था वह अज्ञेय को खिला दिया और खुद भूखे रहे । उनकी उसी मनोदशा के बीच पृथ्वीराज कपूर अपने नाट्यदल को लेकर इलाहाबाद गए । लोगों के लाख मना करने और समझाने के बावजूद अपने नाटक में उन्होंने उन्हें ससम्मान आमंत्रित किया। जब उन्होंने नाटक के अंत में निरालाजी को मंच पर आमंत्रित किया तो लोग अवाक थे ।
सारा इलाहाबाद उन दिनों निराला की विक्षिप्तावस्था की चर्चा रस लेकर कर रहा था । निराला मंच पर डगमगाते कदमों से चढ़े । माइक हाथ में लिया, बोले,"आर यू नो व्हेहर इज गंगा ? व्हेयर इज यमुना ? व्हेयर इज सरस्वती ?" लोग विस्मयपूर्वक अभी उन्हें देख ही रहे थे कि उन्होंने पृथ्वीराज की छाती पर एक घूंसा मारते हुए कहा, हेयर इज यमुना, हेयर इज गंगा, हेयर इज सरस्वती । इतना कहकर निराला दनदनाते हुए थियेटर हॉल से बाहर चले गए । पृथ्वीराज ने लिखा है, "हजारों आशीर्वाद, हजारों शुभकामनाएं मिली हैं जीवन में । हजारों इनाम मिले हैं लेकिन इससे बड़ी, इतना महान आशीष शायद ही कभी मिला हो ! अपनी इसी विक्षिप्तावस्था में मिला हिंदी का सबसे बड़ा पारिश्रमिक (मंगला प्रसाद पारितोषिक) निराला ने अपने मतवाला मंडल के सहयोगी मित्र मुंशी नवजादिकलाल श्रीवास्तव की विधवा पत्नी को दे डाला था । तब "उग्र" ने लेख लिखा था - पागल या समझदार ? मगर "उग्र" को भी तो कम ही लोगों ने समझा । ज्यादातर तो उन्हें पागल ही समझते रहे और आज भी हिंदी के समझदारों के एक बड़े दल ने उन्हें पागल घोषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है ।
सुकरात तो हमेशा कबीर की तरह सड़कों पर उस समय की विकृतियों का मखौल उड़ाते, अट्टाहास करते, गालियां देते चलते रहे । रजनीश पर युवकों को बरगलाने का आरोप लगा । गैलीलियो को पृथ्वी गोल कहने पर धर्मांधों ने पागल कहा, मृत्युदंड सुनाया, यातनाएं दीं । पैगंबरों, तीर्थंकरों को उनके बाद के अनुयायियों ने ही पागल कहा । उन्हें पत्थरों से मारा गया, उन्हें सूली पर टांगा गया, उन्हें जहर दिया गया ।
खिलाड़ियों में मोहम्मद अली, पेले और जॉन मेकनरो से लेकर जिदान की तुनकमिजाजी को लोगों ने विक्षिप्तता ही समझा । फिल्मों के कई ख्यातनाम कलाकार, संगीतकार, निर्माता-निर्देशकों को अपनी अंतिम अवस्था में पागलपन के दौरे पड़ने लगे और एक दिन उन्हें चाहने-पूजने वालों ने ही उन्हें पागल भी घोषित कर दिया । बहुत कम लोगों को शायद यह पता होगा कि अपने अंतिम दिनों में पृथ्वीराज कपूर पृथ्वी थियेटर में अकेले ही प्ले किया करते थे या कभी अपने ड्राइवर को दर्शक दीर्घा में बैठाकर नाटक करते थे । तो क्या बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था की तरह ई बार मनुष्य ऐसी स्थितियों में पड़ जाता है जिनसे मुक्ति पाने के लिए उसका थोड़ा-थोड़ा पागल होना भी जरूरी हो जाता है ।

1 comment:

  1. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

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